खेती का भी होगा 'कार्बन हिसाब': MPUAT में विशेषज्ञ बोले, किसान खुद पहचानें कि उनके खेत से कितना उत्सर्जन हो रहा है

कुलपति प्रो. प्रताप सिंह ने कहा, छोटे और सीमांत किसानों को कार्बन लेखांकन से जोड़ना ज़रूरी; जैविक-प्राकृतिक खेती से घटेगा कार्बन फुटप्रिंट

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News Desk Editorial Authority • 03 Oct, 2026Editorial Desk
October 3, 2026 • 11:35 PM | उदयपुर
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राजस्थान
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खेती का भी होगा 'कार्बन हिसाब': MPUAT में विशेषज्ञ बोले, किसान खुद पहचानें कि उनके खेत से कितना उत्सर्जन हो रहा है
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3 Oct 2026
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खेती का भी होगा 'कार्बन हिसाब': MPUAT में विशेषज्ञ बोले, किसान खुद पहचानें कि उनके खेत से कितना उत्सर्जन हो रहा है
खेती का भी होगा 'कार्बन हिसाब': MPUAT में विशेषज्ञ बोले, किसान खुद पहचानें कि उनके खेत से कितना उत्सर्जन हो रहा है

उदयपुर। उद्योगों की तरह अब खेती का भी कार्बन हिसाब रखने की तैयारी है। खेत से कितना कार्बन निकल रहा है, कितना मिट्टी में जमा हो रहा है, और इसे कैसे कम किया जाए। इसी पर शुक्रवार को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MPUAT) में विशेषज्ञों ने मंथन किया।

मौका था "कृषि में कार्बन लेखांकन: कार्बन-न्यूट्रल खेती" विषय पर अतिथि व्याख्यान का। इसका आयोजन फॉस्फेट रिच ऑर्गेनिक मैन्योर (प्रोम) सोसाइटी और राजस्थान कृषि महाविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग ने मिलकर निदेशालय अनुसंधान में किया।

कुलपति बोले: छोटे किसानों तक पहुंचे कार्बन लेखांकन

मुख्य अतिथि MPUAT के कुलपति प्रो. प्रताप सिंह ने कहा कि मानवीय गतिविधियों से कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। सतत भविष्य के लिए इसे कम करना ज़रूरी है। उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती को कृषि का कार्बन फुटप्रिंट घटाने और प्राकृतिक संसाधन बचाने का अहम तरीका बताया। उन्होंने खास तौर पर लघु और सीमांत किसानों को वैज्ञानिक कार्बन लेखांकन से जोड़ने पर ज़ोर दिया।

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